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Mirzapur The Movie (2026) Review: भौकाल तो है, लेकिन पुराना वाला मिर्जापुर कितना है?

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Mirzapur The Movie (2026) Review: भौकाल तो है, लेकिन पुराना वाला मिर्जापुर कितना है?

मिर्जापुर नाम सुनते ही दिमाग में एक खास तरह की दुनिया बन जाती है—गोलियां, गालियां, बदला, राजनीति, खून-खराबा और वो किरदार जिनके नाम भर से माहौल बदल जाता है। अब जब Mirzapur The Movie (2026) बड़े पर्दे पर पहुंच चुकी है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या फिल्म वही पुराना मिर्जापुर वाला असर पैदा कर पाती है?

मेरा जवाब है—कुछ हद तक हां, लेकिन पूरी तरह नहीं।

फिल्म में पुराने किरदारों की वापसी है, कई जाने-पहचाने चेहरे हैं और कुछ ऐसे moments भी आते हैं जिन पर थिएटर में सीटी बजाने का मन करता है। लेकिन पूरी फिल्म उस level का impact नहीं बना पाती, जिसकी उम्मीद Mirzapur जैसी लोकप्रिय franchise से की जाती है।

कहानी में क्या है?

फिल्म की कहानी उसी crime और power वाली दुनिया को आगे बढ़ाती है, जिससे दर्शक पहले से परिचित हैं। पुराने हिसाब-किताब, टकराव और अपने-अपने फायदे के लिए चल रही चालें कहानी का हिस्सा बनी रहती हैं।

समस्या यह है कि फिल्म का pace काफी धीमा है।

शुरुआत में कहानी को सेट होने में काफी समय लगता है और बीच का हिस्सा भी कई जगह जरूरत से ज्यादा खिंचा हुआ महसूस होता है। कुछ conflicts ऐसे लगते हैं जिन्हें थोड़ा छोटा किया जा सकता था।

एक crime thriller में लगातार tension बने रहना जरूरी होता है, लेकिन यहां कई मौकों पर कहानी की रफ्तार कम हो जाती है और फिल्म थोड़ी boring लगने लगती है।

रोमांस और कुछ जबरदस्ती डाले गए vulgar moments भी कहानी को खास फायदा नहीं पहुंचाते। कई जगह ऐसा लगता है कि इन्हें सिर्फ Mirzapur वाली image बनाए रखने के लिए जोड़ा गया है।

आखिरी आधा घंटा संभाल लेता है फिल्म

जहां फिल्म शुरुआत और बीच में थोड़ी कमजोर पड़ती है, वहीं आखिरी 30-35 मिनट में अचानक रफ्तार पकड़ लेती है।

टकराव बढ़ता है, action शुरू होता है और कहानी अपने climax की तरफ तेजी से बढ़ती है। यही फिल्म का सबसे entertaining हिस्सा है।

इसी दौरान वो Mirzapur वाला भौकाल भी महसूस होता है, जिसके लिए दर्शक थिएटर तक पहुंचे हैं।

अगर पूरी फिल्म की pacing आखिरी हिस्से जैसी होती, तो शायद इसका असर काफी ज्यादा मजबूत होता।

Pankaj Tripathi फिर छा जाते हैं

Pankaj Tripathi कलीन भैया के किरदार में एक बार फिर शानदार नजर आते हैं।

उनका शांत चेहरा और बिना ज्यादा शोर किए सामने वाले पर दबाव बनाने का अंदाज अब भी प्रभावी है। कलीन भैया जब स्क्रीन पर आते हैं तो फिल्म का mood अपने आप बदल जाता है।

उनका किरदार जितना कम बोलता है, कई बार उतना ही ज्यादा असर छोड़ता है।

Ali Fazal का अंदाज

Ali Fazal गुड्डू पंडित के रूप में पूरी energy के साथ दिखाई देते हैं।

उनका attitude और aggressive अंदाज Mirzapur के fans को पसंद आएगा। जहां कलीन भैया का अंदाज controlled है, वहीं गुड्डू की personality ज्यादा impulsive और energetic महसूस होती है।

दोनों के बीच का contrast फिल्म को interesting बनाता है।

Munna Bhai की एंट्री पर माहौल बनता है

Divyenndu का मुन्ना भैया वाला किरदार आते ही nostalgia जगा देता है।

उनकी screen presence अब भी ऐसी है कि दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और theatre में reaction मिलना तय है। पुराने fans के लिए उनके scenes फिल्म के सबसे enjoyable moments में शामिल हो सकते हैं।

Ravi Kishan का अलग अंदाज

Ravi Kishan भी फिल्म में अच्छा surprise देते हैं।

बब्बन यादव के किरदार में उन्हें ऐसा role मिला है जिसमें खतरनाक attitude के साथ comedy का touch भी है। उन्होंने दोनों shades को काफी सहजता से संभाला है।

बाकी supporting cast भी अपने-अपने हिस्से में ठीक काम करती है। पुराने किरदारों और references की मौजूदगी फिल्म में nostalgia जरूर पैदा करती है।

Dialogues और BGM मजबूत

फिल्म के dialogues और background music इसके बेहतर हिस्सों में हैं।

कुछ dialogues ऐसे हैं जिन्हें सुनकर थिएटर में reaction आना स्वाभाविक है। BGM भी कई scenes को जरूरी intensity देता है।

लेकिन action के मामले में फिल्म उतनी प्रभावशाली नहीं है।

कुछ action sequences में वह बड़े पर्दे वाला impact नहीं आता जिसकी उम्मीद थी। कुछ shots की presentation थोड़ी कमजोर लगती है और कहीं-कहीं उनका treatment television serial जैसा महसूस होता है।

असली Mirzapur वाली बात कहां कम पड़ गई?

शायद फिल्म की सबसे बड़ी कमी यही है।

Mirzapur franchise की पहचान सिर्फ violence या gaali-galauj नहीं रही है। उसके पीछे एक rawness, anger और unpredictability भी थी। किरदारों का पागलपन और अचानक बदलती परिस्थितियां कहानी को अलग बनाती थीं।

फिल्म में violence और mass elements जरूर हैं, लेकिन कई जगह वो पुराना Mirzapur kick महसूस नहीं होता।

ऐसा लगता है कि फिल्म उस familiar formula को दोहराती तो है, लेकिन हर बार उसी intensity तक नहीं पहुंच पाती।

क्या फैंस को देखनी चाहिए?

अगर आप Mirzapur के पुराने fan हैं, तो फिल्म में आपके लिए काफी material है।

पुराने किरदार, references, dialogues, violence और कुछ mass moments आपको जरूर पसंद आएंगे। खासकर climax के आसपास फिल्म अच्छी तरह entertain करती है।

लेकिन अगर आप एक tight और लगातार engaging crime thriller की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो धीमी pacing और कुछ कमजोर action sequences आपको परेशान कर सकते हैं।

अंत में Part 2 का संकेत भी मिलता है, जिससे साफ है कि कहानी को अभी पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है।

Final Verdict

Mirzapur The Movie कोई perfect crime thriller नहीं है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियां इसकी धीमी रफ्तार और कुछ कमजोर action sequences हैं। वहीं acting, dialogues, BGM और climax वाला हिस्सा इसकी भरपाई करने की कोशिश करता है।

कलीन भैया, गुड्डू पंडित और मुन्ना भैया जैसे पुराने किरदारों को बड़े पर्दे पर देखना अपने आप में fans के लिए एक experience है।

फिल्म में मिर्जापुर है, लेकिन हर जगह वो पुराना वाला मिर्जापुर नहीं है।

अगर आप franchise के fan हैं, तो थिएटर में इसे एक बार देख सकते हैं। खासकर आखिरी हिस्सा आपके पैसे कुछ हद तक वसूल करा सकता है। Read more 

मेरी Rating: ⭐⭐⭐½/5

Verdict: फैंस के लिए entertaining, लेकिन pacing और action की वजह से एक पूरी तरह संतोषजनक crime thriller नहीं बन पाती।

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Mirzapur The Movie (2026) Review: भौकाल तो है, लेकिन पुराना वाला मिर्जापुर कितना है?

Mirzapur The Movie (2026) Review: भौकाल तो है, लेकिन पुराना वाला मिर्जापुर कितना है?

मिर्जापुर नाम सुनते ही दिमाग में एक खास तरह की दुनिया बन जाती है—गोलियां, गालियां, बदला, राजनीति, खून-खराबा और वो किरदार जिनके नाम भर से माहौल बदल जाता है। अब जब Mirzapur The Movie (2026) बड़े पर्दे पर पहुंच चुकी है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या फिल्म वही पुराना मिर्जापुर वाला असर पैदा कर पाती है?

मेरा जवाब है—कुछ हद तक हां, लेकिन पूरी तरह नहीं।

फिल्म में पुराने किरदारों की वापसी है, कई जाने-पहचाने चेहरे हैं और कुछ ऐसे moments भी आते हैं जिन पर थिएटर में सीटी बजाने का मन करता है। लेकिन पूरी फिल्म उस level का impact नहीं बना पाती, जिसकी उम्मीद Mirzapur जैसी लोकप्रिय franchise से की जाती है।

कहानी में क्या है?

फिल्म की कहानी उसी crime और power वाली दुनिया को आगे बढ़ाती है, जिससे दर्शक पहले से परिचित हैं। पुराने हिसाब-किताब, टकराव और अपने-अपने फायदे के लिए चल रही चालें कहानी का हिस्सा बनी रहती हैं।

समस्या यह है कि फिल्म का pace काफी धीमा है।

शुरुआत में कहानी को सेट होने में काफी समय लगता है और बीच का हिस्सा भी कई जगह जरूरत से ज्यादा खिंचा हुआ महसूस होता है। कुछ conflicts ऐसे लगते हैं जिन्हें थोड़ा छोटा किया जा सकता था।

एक crime thriller में लगातार tension बने रहना जरूरी होता है, लेकिन यहां कई मौकों पर कहानी की रफ्तार कम हो जाती है और फिल्म थोड़ी boring लगने लगती है।

रोमांस और कुछ जबरदस्ती डाले गए vulgar moments भी कहानी को खास फायदा नहीं पहुंचाते। कई जगह ऐसा लगता है कि इन्हें सिर्फ Mirzapur वाली image बनाए रखने के लिए जोड़ा गया है।

आखिरी आधा घंटा संभाल लेता है फिल्म

जहां फिल्म शुरुआत और बीच में थोड़ी कमजोर पड़ती है, वहीं आखिरी 30-35 मिनट में अचानक रफ्तार पकड़ लेती है।

टकराव बढ़ता है, action शुरू होता है और कहानी अपने climax की तरफ तेजी से बढ़ती है। यही फिल्म का सबसे entertaining हिस्सा है।

इसी दौरान वो Mirzapur वाला भौकाल भी महसूस होता है, जिसके लिए दर्शक थिएटर तक पहुंचे हैं।

अगर पूरी फिल्म की pacing आखिरी हिस्से जैसी होती, तो शायद इसका असर काफी ज्यादा मजबूत होता।

Pankaj Tripathi फिर छा जाते हैं

Pankaj Tripathi कलीन भैया के किरदार में एक बार फिर शानदार नजर आते हैं।

उनका शांत चेहरा और बिना ज्यादा शोर किए सामने वाले पर दबाव बनाने का अंदाज अब भी प्रभावी है। कलीन भैया जब स्क्रीन पर आते हैं तो फिल्म का mood अपने आप बदल जाता है।

उनका किरदार जितना कम बोलता है, कई बार उतना ही ज्यादा असर छोड़ता है।

Ali Fazal का अंदाज

Ali Fazal गुड्डू पंडित के रूप में पूरी energy के साथ दिखाई देते हैं।

उनका attitude और aggressive अंदाज Mirzapur के fans को पसंद आएगा। जहां कलीन भैया का अंदाज controlled है, वहीं गुड्डू की personality ज्यादा impulsive और energetic महसूस होती है।

दोनों के बीच का contrast फिल्म को interesting बनाता है।

Munna Bhai की एंट्री पर माहौल बनता है

Divyenndu का मुन्ना भैया वाला किरदार आते ही nostalgia जगा देता है।

उनकी screen presence अब भी ऐसी है कि दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और theatre में reaction मिलना तय है। पुराने fans के लिए उनके scenes फिल्म के सबसे enjoyable moments में शामिल हो सकते हैं।

Ravi Kishan का अलग अंदाज

Ravi Kishan भी फिल्म में अच्छा surprise देते हैं।

बब्बन यादव के किरदार में उन्हें ऐसा role मिला है जिसमें खतरनाक attitude के साथ comedy का touch भी है। उन्होंने दोनों shades को काफी सहजता से संभाला है।

बाकी supporting cast भी अपने-अपने हिस्से में ठीक काम करती है। पुराने किरदारों और references की मौजूदगी फिल्म में nostalgia जरूर पैदा करती है।

Dialogues और BGM मजबूत

फिल्म के dialogues और background music इसके बेहतर हिस्सों में हैं।

कुछ dialogues ऐसे हैं जिन्हें सुनकर थिएटर में reaction आना स्वाभाविक है। BGM भी कई scenes को जरूरी intensity देता है।

लेकिन action के मामले में फिल्म उतनी प्रभावशाली नहीं है।

कुछ action sequences में वह बड़े पर्दे वाला impact नहीं आता जिसकी उम्मीद थी। कुछ shots की presentation थोड़ी कमजोर लगती है और कहीं-कहीं उनका treatment television serial जैसा महसूस होता है।

असली Mirzapur वाली बात कहां कम पड़ गई?

शायद फिल्म की सबसे बड़ी कमी यही है।

Mirzapur franchise की पहचान सिर्फ violence या gaali-galauj नहीं रही है। उसके पीछे एक rawness, anger और unpredictability भी थी। किरदारों का पागलपन और अचानक बदलती परिस्थितियां कहानी को अलग बनाती थीं।

फिल्म में violence और mass elements जरूर हैं, लेकिन कई जगह वो पुराना Mirzapur kick महसूस नहीं होता।

ऐसा लगता है कि फिल्म उस familiar formula को दोहराती तो है, लेकिन हर बार उसी intensity तक नहीं पहुंच पाती।

क्या फैंस को देखनी चाहिए?

अगर आप Mirzapur के पुराने fan हैं, तो फिल्म में आपके लिए काफी material है।

पुराने किरदार, references, dialogues, violence और कुछ mass moments आपको जरूर पसंद आएंगे। खासकर climax के आसपास फिल्म अच्छी तरह entertain करती है।

लेकिन अगर आप एक tight और लगातार engaging crime thriller की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो धीमी pacing और कुछ कमजोर action sequences आपको परेशान कर सकते हैं।

अंत में Part 2 का संकेत भी मिलता है, जिससे साफ है कि कहानी को अभी पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है।

Final Verdict

Mirzapur The Movie कोई perfect crime thriller नहीं है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियां इसकी धीमी रफ्तार और कुछ कमजोर action sequences हैं। वहीं acting, dialogues, BGM और climax वाला हिस्सा इसकी भरपाई करने की कोशिश करता है।

कलीन भैया, गुड्डू पंडित और मुन्ना भैया जैसे पुराने किरदारों को बड़े पर्दे पर देखना अपने आप में fans के लिए एक experience है।

फिल्म में मिर्जापुर है, लेकिन हर जगह वो पुराना वाला मिर्जापुर नहीं है।

अगर आप franchise के fan हैं, तो थिएटर में इसे एक बार देख सकते हैं। खासकर आखिरी हिस्सा आपके पैसे कुछ हद तक वसूल करा सकता है। Read more 

मेरी Rating: ⭐⭐⭐½/5

Verdict: फैंस के लिए entertaining, लेकिन pacing और action की वजह से एक पूरी तरह संतोषजनक crime thriller नहीं बन पाती।

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